दोस्तों , ब्लॉग की दुनिया में बहुत दिनों से शामिल होना चाह रहा था,पर किसी न किसी कारण रूबरू नहीं हो पा रहा था। मौजूदा मनोभावों ने मजबूर किया तो आना ही पड़ा।
ना उम्मीद कर किसी से नसीहत देते हैं, अपने भी । हाँ, क्यूँ करना चाहिए , क्या जरूरत है । रिश्ते, नाते ,एहसास सब बेमानी है। कौन कितने कदम साथ रहेगा, यह वक्त और जरूरत तय करेगा, तेरे जज्बात नहीं ।। सांसे चलानी है तो वक्त के साथ परिभाषा बदल ले अपनों की, अपनी धड़कन की , नसीहत बिठा ले मन में ।। पर, बार बार टूटने पर भी ना समझ पायेगा तू दिमाग गिरवी जो रख दिया है अपनों के पास ।।
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