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तुम



वो तेरा आते ही खिडकी के दरवाजे खोलना,
हवा के झोंके के साथ तेरी खुशबू का मेरे अंदर उतरना,
अपने इस उतरने को तेरा बेफ़िक्री से महसूस करना,
कॉफी पे अनायास ही किस्सागोयी करना,
और,अपने मे बांधते चले जाना ।
फिर यूं ही आते - जाते रहना,
कमरे के साथ चेतना की गहराइयों में,
घटित होता नियति का एक खुबसूरत नजराना ।।


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  1. सुन्दर अहसास की कविता
    अरविंद मिश्र

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उम्मीद

  ना उम्मीद कर किसी से नसीहत देते हैं, अपने भी । हाँ, क्यूँ करना चाहिए , क्या जरूरत है । रिश्ते, नाते ,एहसास सब बेमानी है। कौन कितने कदम साथ रहेगा, यह वक्त और जरूरत तय करेगा, तेरे जज्बात नहीं ।। सांसे चलानी है तो वक्त के साथ परिभाषा बदल ले अपनों की, अपनी धड़कन की , नसीहत बिठा ले मन में ।। पर, बार बार टूटने पर भी ना समझ पायेगा तू दिमाग गिरवी जो रख दिया है अपनों के पास ।।